moral stories in hindi - सत्य कभी छुपाये नहीं छुपता

moral stories in hindi - सत्य कभी छुपाये नहीं छुपता

Moral stories in hindi 


एक गाँव में गाँव के एक बहुत ही धनि और प्रतिष्ठावान  व्यक्ति सुभान मिया ( नाम बदला हुआ है। ) रहते था ।

एक दिन क्या हुआ की सुभान मिया अपने घर से खेत की और निकले खेत में जाने के कुछ समय बाद सुभान मिया को बड़ी ज़ोर की टट्टी आ गयी।

सुभान मिया ने सोचा की इस खेत में कोई तो मुझे नहीं देख रहा है।  अब क्या करूँ ? सुभान मिया ने सोचा की घर जाऊँगा तब तक तो टट्टी निकल ही जायेगी।

वह खेत में ही एक बैर के वृक्ष के निचे टट्टी करने के लिए बैठ गया।  उस बैर से हवा के कारण पक्के हुए बैर भी निचे गिर गए थे।
Moral Stories In Hindi
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उस व्यक्ति ने उन बैरो को उठाया और खाना शुरु कर दिया और साथ साथ में टट्टी भी कर रहा था। उसने सोचा यहाँ कौन देख रहा है मुझे ?

उसने एक साथ दोनों कार्य किये जो की वातावरण की द्रष्टि से गलत था।

एक तो बाहर टट्टी नहीं करनी चाहिये क्योंकि वातावरण प्रदूषित होता है।
दूसरा उसके साथ में वह बैर भी खा रहा था।  खाना - पखाना दोनों साथ जिससे की स्वास्थ्य को नुकसान।

जब वह खेत से घर को जा रहा था , तो रास्ते में चलते - चलते सोच रहा था की किसी ने एक साथ दोनों कार्य करते हुए देखा तो नहीं। वरना गाँव में बहुत इज्जत है हमारी सब धुल में मिल जाएगी।

उसी दिन शाम को गाँव में एक नाच गाने का कार्यक्रम रखा गया था।  गाँव के सभी प्रतिष्ठित व्यक्तियों को बुलाया गया था। जिसमे सुभान मिया भी थे।

सुभान मिया को सबसे आगे बिठाया गया था , क्योंकि गाँव के सबसे धनि व्यक्ति थे।

जब कार्यक्रम शरू हुआ तो कुछ देर बाद एक वैश्या नाचने के लिए मंच पर आयी।

वैश्या ने जैसे ही ठुमका लगाया सब लोग ताली बजाने लग गए।

वैश्या ने गाना शरू किया और जैसे ही यह पंक्ति गाई की - "सुभान तेरी बतिया जान गयी राम !"

सुभान मिया के तो तोते उड़ गए। उसने सोचा अरे में तो अकेले में टट्टी किया था वहाँ कोई नहीं था तो इस वैश्या को कैसे पता चल गया।

उसने वैश्या के ऊपर नोटों की गड्डी उड़ा दी । ताकि अब वैश्या आगे कुछ न बोले।

वैश्या ने आगली पंक्ति गाई - "सुभान तेरी बतिया कह दूँगी राम !"  और ठुमका लगाया।

सुभान मिया ने सोचा की अभी तो कुछ कहा नहीं और यदि कह दिया तो पोल खुल जायेगी। उसने वैश्या को अपनी हीरे से जड़ी अंगूठी दे दी। वैश्या फिर भी न रुकी !

वैश्या ने गाया - "सुभान तेरी बतिया कह रही हूँ राम !"

सुभान मिया के तो पसीने छूटने लग गए। अब तो इज्जत ख़राब  उसने अपने ऊपर ओढ़ी हुयी साल जिसमे हीरे मोती जड़े थे बहुत कीमती थी  वैश्या की और फेंक दी। ताकि वह अब तो चुप हो जायेगी।

वैश्या ने सोचा की सुभान मिया को गीत बहुत पसंद आ रहा है। उसने और ज़ोर से ठुमका लगाया और गाने लगी - "सुभान तेरी बतिया कहने जा रही हूँ राम !" 

सुभान मिया अपनी जगह से उठे और बोले - "वैश्या की जात न तुझे अपनी इज्जत की फिकर रहती है और न ही दुसरो की इज्जत का ख़याल रखती है। "

कब से कह रही है सुभान तेरी बतिया कह दुँगी राम।  क्या कहेगी ? कह दे।

यही कहेगी ना की सुभान मिया बैर के पेड़ के निचे टट्टी किये थे और साथ में बैर भी खाए थे यही कहेगी ना। 

वैश्या ने कहा यह बात तो मुझे पता ही नहीं थी। यह तो आपने अभी बताई।

मैं तो भगवान का भजन गा रही थी की "है ! प्रभु में तो गुणगान कर दूंगी तेरा गुणगान कर रही हूँ "

कहानी का सार : सत्य को कितना भी छुपाने के कौशिश करो , किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाता है।  
Kabir Das - संत कबीर दास जी का पूरा जीवन परिचय

Kabir Das - संत कबीर दास जी का पूरा जीवन परिचय

Kabir Das

संत कबीर साहब भक्ति काल के महाकवियों में अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखने वाले संत कबीर दास के बारे में हम इस चर्चा करने वाले है , की कबीर दास जी कौन थे ,क्या वे भगवान का अवतार थे ?  कबीर दास जी का जन्म कैसे हुआ ,उनके माता पिता कौन थे ,उन्होंने किस विषय पर अपना पूरा जीवन न्योछावर कर दिया। यही सब बाते आप जानने वाले है । और हाँ आपको कुछ कबीर दास जी के सुप्रसिद्ध दोहे भी बताये जायेंगे तो पड़िए इस पोस्ट को और जाने कबीर दास जी के बारे में ।

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कबीर दास जी के विचार [Thoughts Of  Kabir Das Ji]

कबीर दास जी भक्तिकालीन निर्गुण धरा के ज्ञानमार्गी शाखा (जो केवल ज्ञान को ही भक्ति मानते है ?)  के  कवि माने जाते है। कबीर दास जी एक महान भक्त भी है। 

कबीर दास जी को समाज सुधारक के रूप में भी मान्यता प्राप्त है उन्होंने मनुष्य समाज में चल रही अनेक कुरीतियाँ , एवं बाहरी आडम्बरो , कुप्रथा जैसे दहेज़ प्रथा ,स्त्री की सती प्रथा , तथा भक्ति मार्ग  में अनैक नियम आदि का खंडन किया है। 

कबीर दास जी को धर्म प्रचारक भी कहा जाता है उन्होंने धर्म की एक ऐसी नींव रखी जो आज भी कोई असत्य साबित नहीं कर सकता है।  कबीर  ने मूर्ति पूजा का भी बहुत विरोध किया है। उनका मानना था की भगवन मूर्ति  की पूजा करके नहीं बल्कि ज्ञान तत्व से जान कर प्राप्त होते है। 

समाज  में व्याप्त वैषम्य ,अंधविश्वाश और उसकी प्रवृतियों पर उन्होंने व्यंग्य का प्रहार किया है , और उनको झूठा साबित  किया है। 

वे निराकार  ईश्वर को मानते थे मूर्ति पूजा का तो उन्होंने हमेशा खंडन किया है  .वे ईश्वर की प्राप्ति के लिए ज्ञान को साधन मानते थे। उन्होंने योग - साधना के गूढ़ रहस्यो को भी अपने दोहे एवं कविताओं में प्रस्तुत किया है। 

निराकर ईश्वर को पाने के लिए वे इन्द्रिय संयम ,ज्ञान मार्ग तथा योग साधना को महत्वपूर्ण मानते थे। प्रेम की अपार अनुभूति भी उनके काव्य में स्पष्ट रूप से प्राप्त होती है। 

नाम महिमा ,गुरु का महत्व ,सदाचार आदि विषयो पर केंद्रित रचनाये कबीर के काव्य को संत सौंदर्य से भी अनुप्रमाणित भी करती है। 

कबीर जी की मान्यता थी की जिनका कर्म अच्छा ऊँचा होता है वही बड़ा कहा जा सकता है ,जाती से कोई ऊँचा - निचा नहीं होता है। ज्ञान से ही व्यक्ति की पहचान होती है।

इस पर भी कबीर जी ने एक साखी कही है।
जात न पूछिए साध की , पूछ लीजिये ज्ञान। 
मोल करो तलवार का ,पड़ी रेन दो म्यान ।। 

कबीर दास जी की भाषा खिचड़ी भाषा है। अपने देश में अनेक जगह पर यात्रा करने के कारण उन्होंने कई जगह से भाषाओ को ग्रहण किया है और वहां की वाणी से परिचित हुए है। वहाँ के शब्दों को भी ग्रहण करते रहे ,यही कारण है की उनकी  भाषा में अनके बोलियों के शब्द होए है । 

उनके प्रतिक ,रूपक तथा अन्योक्ति काव्य - साहित्य की धरोहर है । उनके काव्य अधिकतर अन्योक्ति के द्वारा ही प्रस्तुत किये है । जैसे :- 
माली आवत देखकर ,कलियन करी पुकारी। 
फुले - फुले चुन लिए काल ही हमारी बारी।।

कबीर दास के इस दोहे में माली ,कलि ,फूल ,और कल की बात करी है ,पढने से तो यह ऐसा लगता है जैसे किसी बाग़ या बगीचे की बात हो रही की माली को आते देख कलियाँ कहा रही की की फूलो को तो चुन कर तोड़ लिया और कल हमारी बारी है। 


दोहे की व्याख्या :- उपरोक्त दोहे में कबीर दास जी ने अन्योक्ति का प्रयोग किया है , जैसे :- माली का अभिप्राय काल  या यम से है , और कलि का मतलब युवा पीढ़ी से है । और फूलो का मतलब बुढो से है । 

जिस प्रकार माली रूपी काल , फूल रूपी बूढ़े व्यक्ति को तोड़ कर अपने साथ ले जाता है। उसी प्रकार यह चक्र चलता रहता है और एक दिन वही कलि रूपी जवान व्यक्ति भी एक दिन बुढा हो जाता है और काल का ग्रास बन जाता है और इस दुनिया से चला जाता है । 

Kabir Das In Hindi [कबीर दास जी का जीवन परिचय]

कबीर दास के जीवन परिचय को  हम चार भागो में बाँटते है 

  1. कबीर दास का जन्म 
  2. कबीर की  शैक्षिक योग्यता 
  3. कबीर दास की मृत्यु 
  4. कबीर दास की रचनाएँ एवं भाषा 
  5. कबीर से सम्बंधित कहनियाँ  पर उनकी जीवन शैली 
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कबीर का जन्म

वैसे तो कबीर के जन्म को लेकर आज तक स्पष्ट रूप से कोई व्यख्या नहीं कर पाया है । न ही उनके माता - पिता का कोई प्रमाण है कई लोगो का मानना है की कबीर जी ने जन्म नहीं लिया वे धरती पर अजन्मे ही अवतरित हुए है। 

लेकिन कुछ का मानना है कबीर का जन्म हुआ है यह पहेली अभी तक अनसुलझी ही है , इसे कोई नहीं सुलझा सका है 

ऐसा माना जाता है की कबीर का जन्म बनारस में विक्रम संवत 1455 ई. (सन 1398 लगभग) में हुआ था  निरु तथा नीमा नामक दंपती उनके माता पिता माने जाते है।  उन्होंने कबीर को बनारस के लहरतारा तालाब के किनारे पाया था । इनकी ममता के छाँव में ही कबीर दास का पालन पोषण हुआ था ।

कबीर का परिवार व्यवसाय से जुलाहा था । वे कपडा बुनने का कार्य करते थे ।

कबीर जी कर्म योगी थे , वे कर्म को प्रधान मानते थे ।

कबीर का विवाह पत्नी और पुत्र :


वैसे तो कबीर जी भक्ति का रंग चढ़ने के कारण विवाह नही करना चाहते थे ,परंतु समाज फैले इस अंधविश्वास के कारण की भक्ति करने के लिए घर परिवार को त्यागना पड़ता है ,सन्यासी वेश भूषा धारण करनी पड़ती है , इन सब बातों को झूठा साबित करने के लिए उन्होंने विवाह किया । और अपनी बातों एवं सिद्धान्तों पर खरे भी उतरे।

कबीर दास की पत्नी का नाम लोई था । उनकी दो संतान भी हुई पुत्र का नाम कमाल था एवं पुत्री का नाम कमाली था।


कबीर की शिक्षा


कबीर ने किसी आश्रमं या किसी विद्यालय से शिक्षा ग्रहण नहीं की थी, उन्होंने स्वामी रामानंद जी को अपना गुरु बनाया था , और वे उनके परम शिष्य भी बने। बाद में कबीर जी ने रामानंद जी को ही अपना शिष्य बना  लिया 


इसका रहस्य जानने के लिए आगे पढ़ते रहिये।


कबीर दास की मृत्यु

कबीर दास की मृत्यु को लेकर भी एक रोचक बाद सामने आती है की कबीर दास को अपने अंतिम क्षणों का पता चल गया था। 

वैसे तो कबीर दास जी काशी में ही रहते थे ,काशी में ही उनका निवास स्थान था । ऐसी मान्यता है की काशी में प्राण त्यागने वाले व्यक्ति को मुक्ति मिल जाती है । वह जन्म - मरण के बन्धनों से मुक्त हो जाता है । 

इसी कारण जब कबीर जो को अपने आखरी समय का पता लगा तो वे काशी को छोड़कर मगहर चले गए। 
ऐसा माना जाता है की मगहर में प्राण त्यागने वाले व्यक्ति को नर्क की घोर यातनाये भोगनी पड़ती है और उसे कभी मुक्ति भी नहीं मिलती। 

किन्तु कबीर दास जी तो अपनी भक्ति को ही मुक्ति का साधन मानते थे उनका कहना था की भक्ति के द्वारा ही मनुष्य मोक्ष को प्राप्त कर सकता है

इस बात को ही सच करने के लिए कबीर दास जी ने मगहर में प्राण त्यागे थे। 

चाहे काशी में मरो या मगहर में अपने - अपने कर्मो के अनुसार उन्हें स्वर्ग और नरक प्राप्त होते है। 

कबीर का देहावसान विक्रम संवत 1551 ई.  ( सन 1494  )  में उत्तरप्रदेश के मगहर में हुआ था।  

मान्यता है की कबीर जी के मरने के बाद उनका शरीर उस स्थान से गायब हो गया था। और वहाँ पर केवल फूल ही फूल बचे थे ,जिनको हिन्दू और मुस्लिम समाज ने आधे आधे बाँट लिए और ले गए थे । 

कबीर दास की रचनाएँ एवं भाषा  :-

कबीर दास की रचनाओं में कई प्रकार की भाषाएँ मिलती है उन्होंने किसी एक भाषा में अपने काव्य नहीं , उनकी भाषा में ब्रज ,अवधी ,राजस्थानी ,खड़ी बोली ,पंजाबी , हरयाणवी ,आदि भाषाओं का समावेश है।

इन सब भाषा के मिलावट होने के कारन कबीर की भाषा को सधुक्कड़ी ,खिचड़ी ,पंचमेल आदि कहा जाता है।

कबीर ने कोई लिखित रचना नहीं की है केवल उनकी वाणियाँ है , उनके परलोक जाने के बाद उनके अनुयायियों उनकी वाणियों का संग्रह किया और उसे एक ग्रन्थ का रूप दिया जिसे हम कबीर का ग्रन्थ " बिजक " कहते है

बीजक ग्रन्थ को मुख्य तीन भागो में विभाजित किया गया  है -

  • साखी 
  • सबद [ पद  ]
  • रमैनी  

1.  कबीर की सखियाँ [ Kabir ki Sakhiyan ]

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कबीर की साखी शब्द को संस्कृत भाषा से लिया गया है जिसका शब्दि अर्थ "साक्षी " होता है। इसका अधिकतर उपयोग धर्म के उपदेश देने के लिए किया गया है। कबीर की साखी अधिकतर दोहा छंद में लिखी गयी है परन्तु कहीं - कहीं इसमें सोरठा का भी उपयोग किया गया है। 

कबीर की शिक्षा का प्रचार अधिकांशत: साखी में ही किया गया है । 

कबीर की प्रसिद्ध साखी के कुछ  उदहारण : 
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सबद [ पद  ] : 

सबद को गेय पद कहा जाता है ,क्योकि इसे गाकर बताया जाता है ,इसमें संगीत विध्यमान होता होता है। इसे एक लय में गाया जाता है। इसमें उपदेश के स्थान पर भावना की प्रधानता होती है। क्योंकि इसमें कबीर ने अपना प्रेम प्रगट किया है।

कबीर के सबद का उदाहरण  
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रमैनी 

रमैनी को चौपाई छंद का प्रयोग किया गया है। इसमें कबीर ने अपने रहष्यमयी एवं दार्शनिक विचारो को अभिव्यक्त किया है। रमैनी को बीजक की प्रस्तावना भी कहते है। इसमें कबीर दास जी ने हिन्दू ,मुस्लिम ,सिख आदि धर्मो को सामान रूप से धार्मिक शिक्षा  है। रमैनी में 84 पद बताये गए है। 


कबीर दास जी के दोहे [Kabir Das Ke Dohe]

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Kabir Das Ke Dohe

दुर्बल को न सताइए ,जाकी मोटी हाय। 
मरी चाम की स्वांस से ,लौह भसम हुई जाय ।। 


अर्थ :- दुर्बल  व्यक्ति को नहीं सताना चाहिए ,क्योकि अगर कोई  दुर्बल दुःखी होकर श्राप देता है तो ,उसका श्राप  फलित हो जाता है ,और व्यक्ति का विनाश इस प्रकार हो जाता  है जिस प्रकार लौहार चमड़े से की फुकनी से लौहे को  पिघला देता है ,एवं उसे भस्म कर देता है  । 

साईं इतना दीजिये ,जामैं कुटुम समाय। 
मैं भी भूखा ना रहूँ ,साधु न भूखा जाय।।


अर्थ :-  कबीर दास जी भगवान से  केवल  इतना ही धन की माँग कर रहे ,जितने  से वे उनका परिवार का पालन - पौषण कर सके। और यदि उनके घर कोई साधु -संत या व्यक्ति आ जाए तो  वो उनके घर से भूखा न  लौटे। 
क्योंकि यदि  व्यक्ति के पास अधिक धन हो  जाता है ,तो  धन के मद में चूर होकर वह  अपने विनाश की  और बढ़ने लगता है। 

जाती हमारी आत्मा ,प्राण हमारा नाम। 
अलख हमारा इष्ट है ,गगन हमारा ग्राम।। 

अर्थ :- कबीर इस दोहे में  कबीर दास जी ने  शरीर में विद्यमान आत्मा को जाती बताया है  , और स्वयं  को प्राण बताया है।  कबीर दास जी के ईश्वर सबसे  निराले है  उनका गुणगान करना हर किसी के  भाग्य ने नहीं होता है ,जिन पर उनकी कृपा  होती है  उनको वो पल भर में मिल जाते  है ।

यहाँ  गगन हमारा  ग्राम से कबीर जी का आशय  है  योगियों के प्राण ब्रम्हांड ( सातवां चक्र  सहस्त्रार ) में निवास करते  है  , अतः उनका गाँव  गगन में  है। 

कामी क्रोधी और लालची ,इनसे भक्ति न होय। 
भक्ति करे कोई शूरमाँ , जाती वरण कुल खोय।।

अर्थ :- कबीर  दास जी के अनुसार काम  वासना में रत ,अधिक क्रोध करने वाला एवं लालच  करने वाला व्यक्ति कभी  भी भगवान की भक्ति नहीं कर सकता। भक्ति  तो लाखों -करोड़ो में कोई विरला  (दुर्लभ )  व्यक्ति ही कर  सकता है ,जो अपनी जात ,वरण ,और परिवार को  भूलकर  भगवान में आपने ध्यान लगता है। 

नोट :- यहाँ पर परिवार को भूलने से मतलब  परिवार को छोड़ना नहीं है ,कुछ  समय परिवार से मन को हटा कर  भगवान में लगाना  इसका अर्थ  है। 

ऊँचै कुल में जनमियाँ ,जे करणी ऊँच न होई। 
सोवन कलस सुरै भरया ,साधू निंध्या सोइ।।


अर्थ :- कबीर दास जी का कहना है की ऊँचे कुल ( परिवार :- जैसे  ब्राम्हण  ) के घर में जन्म लेने से भी कोई  लाभ नहीं  है , यदि करनी (कार्य ) अच्छे नहीं किये तो ,जिस प्रकार  कलस सोने का हो लेकिन उसमे  सूरा (मदिरा ,शराब ) भरी  हो तो ,संत ,सज्जन लोग  उसे  अपवित्र ही  मानते है। 

  तरवर तास बिलंबिए ,बारह मास फलंत। 
सीतल छाया गहर फल ,पंखी केलि करंत।।


अर्थ :-  कबीर  जी का कहना है की उस वृक्ष के निचे विश्राम करना चाहिए ,जिस  पर  वर्ष के  प्रत्येक माह फल लगते हो ,और जिस पेड़ के पर की छाँव  गहरी हो ,एवं जिस पर पक्षी  किलकारी मारते एवं  चहचहाते है। ऐसा  वृक्ष बहुत ही आनंद प्रदान करता है। 

जब गुण कूँ गाहक मिलै ,तब गुण लाख बिकाइ। 
जब गुण कौं गाहक नहीं ,कौड़ी बदलै जाइ।।

अर्थ :- कबीर  दास जी  कहते  है की ,अच्छे गुणों का महत्व तभी है जब उसका ग्राहक (गुणों की परख करने वाला ) मिले । अन्यथा मूर्खो के सामने कितने भी उपदेश दे दो ,वे उनको कौड़ी के सामान ही समझते है।
इसलिए विद्वान् लोग मूर्खो से बहस नहीं करते है।  

सरपहि दूध पिलाइये ,दूधैं विष हुई जाइ। 
ऐसा कोई ना मिलै ,सौं सरपैं विष खाइ।।

अर्थ :-सर्प (साँप ,नाग ) को दूध पिलाने से कोई लाभ नहीं है ,क्योकि इससे दूध भी विषैला हो जाता है , दुनियाँ ऐसा कोई व्यक्ति नहीं देखा जो विष का पान करे। 

नोट :- भगवान शंकर ने संकट से निवारण के लिए विष पिया था और मीरा बाई में प्रभु भक्ति में लींन  विष पिया था। जो साधारण मनुष्य के बस की बात नहीं। 

करता केरे बहुत गुणं ,आगुणं कोई नांहि। 
जे दिल खोजौं आपणौं,तो सब औंगुण मुझ मांहि।।

अर्थ:- कर्ता (करने वाला ) में बहुत सारे गुण विद्यमान होते है, किन्तु अवगुण कोई भी नही होता है । जब कबीर जी अपने आप मे ही गुणों को देखते है तो कहते है कि सारे अवगुण तो मुझमें ही है ।
   
जात हमारी ब्रम्ह है ,मात - पिता है राम।
गृह हमारा शून्य है। अनहद में विश्राम।।

अर्थ:- कबीर जी आत्मा का संबोधन करते हुए कहते है कि उनकी जात ब्रम्ह के सामान है ,माता-पता एक परमतत्व ईश्वर है ,घर शुन्य अर्थात निराकार ,और भगवान के हाथो में स्थित शंख (अनहद ) में ठहराव है।  

कबीर से सम्बंधित ज्ञानवर्धक कहानियाँ [KABIR DAS STORY]

कबीर दास के जीवन से सम्बंधित बहुत से तथ्य ऐसे है जो बहुत काम लोगो को पता है। उन्ही में से हम कुछ तथ्यों और जीवन शैली को आपके सामने प्रस्तुत कर रहे है। 

कबीर की अपने मन पर विजय :

एक बार जब कबीर दास जी बाजार के बीच से गुजर रहे थे तब उन्हें  जलेबी की दुकान दिखाई दी ,तो उनका जलेबी खाने का मन हो गया।  कबीर जी कुछ देर तक तो उस दुकान के सामने खड़े रहे फिर उन्होंने जलेबी की दुकान से जलेबी खरीदी और आगे चल दिए । एक वृक्ष के निचे जाकर बैठ गए । 

उन्होंने उन जलेबी को नहीं खाया और अपने मन से कहने लगे की है मन यह तो तेरा काम है जलेबी खाना।  तेरी ही इच्छा थी जलेबी खाने की इसलिए मेने तेरे लिए जलेबी खरीदी है । 

कबीर का मन बार - बार जलेबी खाने को करता लेकिन कबीर जी अपने मन से बार - बार अपने मन से यही कहते की यदि तुम जलेबी खाना ही चाहते हो, तो मेरे शरीर से बहार निकला कर खा सको तो खा लो ।

ऐसा बार - बार करने से कबीर जी की जलेबी खाने की इच्छा समाप्त हो गयी और उन्होंने उन जलेबियो को नहीं खाया । जलेबिया उनके सामने ऐसी ही पड़ी रही और कबीर जी मन से लड़ाई करने लग गए ।

कुछ देर बाद एक कुत्ता आया और उन सारी जलेबियों को खाकर चला गया । कबीर जी को मन को समझाने की धुन में पता ही नहीं चला। 

इस प्रकार बार - बार मान को मारने के कारण कबीर जी ने अपने मन पर काबू पा लिया और मन से जित गए । 

कबीर ने रामानंद को गुरु कैसे बनाया ?

जब शुरुवात में कबीर जी ने रामानंद जी को कहा की मुझे अपना शिष्य बना लीजिये लेकिन रामानंद जी ने कबीर को शिष्य बनाने से मन कर दिया। कबीर ने भी ठान लिया की गुरु बनाऊंगा तो रामानंद जी को ही।  

स्वामी रामानंद को गुरु बनाने के लिए कबीर दास ने एक युक्ति अपनायी। उन्हें पता था की महाराज रामानंद जी प्रातकाल में   4  बजे गंगा जी के घाट पर स्नान करने जाते है ।

तब रास्ते में सीढ़ियों पर लैट जाऊंगा और जैसे ही गुरुदेव मुझे लातो से स्पर्श करेंगे में उनके पाँव पकड़ कर उन्हें गुरु बना लूंगा। 

कबीर ने ऐसा ही किया गुरु रामानंद जी के आने से पहले ही कबीर जी रात्रि के आधे पहर में आकर ही सीढ़ियों पर लेट गए।

जब गुरु रामानंद जी स्नान के लिये गंगा जी के घाट पर आए तो रात्री में अंधेरा होने के कारण उन्होंने कबीर को नही देखा और उनकी लात से ठोकर मार दी ।

ठोकर मारते ही रामानंद जी कबीर को कहा : - " अरे बेटा उठो तुम्हे लगी तो नही ? "

बस इतना सुनते ही कबीर जी ने रामानन्द जी के पाँव पकड़ लिये ओर कहा कि मुझे शिष्य बना लीजिये , गुरु रामानन्द जी नही माने उन्होंने कबीर से कहा में तुम्हे अपना शिष्य नही बना सकता ।

में केवल राज परिवार के राजकुमारों को ही अपना शिष्य बना सकता हूँ ।

कुछ देर बाद कबीर जी ने रामानन्द जी से एक प्रश्न पूछा ।

कृपया बताईए की किसी पिता की संपत्ति और ज्ञान पर किसका अधिकार होता है ? इस पर रामानंद जी ने कहा कि किसी भी पिता की सम्पती पर उसके बेटे का अधिकार होता है ।

तो कबीर दास जी ने कहा कि अभी ही आपने मुझे बेटा कहा था , अतः अब आप मेरे पिता हुए अब आपकी संपत्ति और शिक्षा पर मेरा पूर्ण अधिकार है । इस प्रकार कबीर ने अपना अधिकार बता दिया ।

रामानन्द जी कुछ नही कह पाये और अंत मे कबीर जी को अपना शिष्य सस्वीकार करना ही पड़ा।

इस तरह कबीर जी ने स्वामी रामानन्द को अपना गुरु बना लिया और स्वयं उनके बन गए चेले।

कुछ समय पश्चात रामानन्द ने कबीर दास को अपना गुरु बनाया ।

यह जानने ले लिए आगे पढ़ते रहीये ।

कबीर की एक सांस की कीमत :

कबीर दास जी निरंतर भगवान का मन ही मन सुमिरन किया करते थे । हर क्षण केवल भगवान कर नाम ही उनकी सांसो में चला करता था । और ध्यान भी ईश्वर में ही लगा रहता था ।

कबीर दास के माता पिता जुलाहा थे , अतः वे भी कपड़े बुनने ओर कपड़े सिने का कार्य किया करते थे ।

एक दिन कबीर जी कपड़ा सी रहे थे तो सुई से धागा निकल गया । कबीर जी सुई में फिर से धागा पिरोने लग गए लेकिन धागा नही पिरोया गया ।

धागा पिरोते - पिरोते कबीर जी का ध्यान एक पल के लिये भगवान के नाम सुमिरन से हट ओर सुई धागे में लग गया ।

कबीर दास ने अगले ही क्षण ध्यान को फिर से सुमिरन में केंद्रित कर दिया।

जोर- जोर से बिलख -बिलख कर रोने लग गये । जब सब ने  कबीर दास को रोते हुए देखा तो सब पूछने लग गए की तुम क्यों रो रहे हो ?

कबीर ने जवाब दिया के मेरा एक साँस बेकार चली गयी । मेरा ध्यान एक पल के लिए प्रभु से अलग हो गया था। अगर उस समय मेरी मृत्यु हो जाती तो में ईश्वर को क्या मुँह दिखता।

मेरा तो जीवन नष्ट हो जाता मेरी मुक्ति तो टल ही जाती इसलिए मुझे बहुत दुःख हो रहा है ,की मेने एक सुई धागे के कारण अपना ध्यान प्रभु से हटा लिया । एक साँस भी कितनी कीमती  है मैने उसे ऐसे ही जाने दिया।

इस प्रकार कबीर ने साँसो के महत्व को समझाया। और कहा इसकी कीमत कोई नहीं लगा सकता है । इसी के सहारे तो प्रभु का नाम शरीर में चल रहा है।

इस पर कबीर ने एक साखी कही :
निरंजन माला ,घट में फिर है दिन - रात,
ऊपर आवे निचे जावे, साँस - साँस चढ़ जात ।
संसारी नर समझे नाहीं,बिरथा उमर गवात,
निरंजन माला घट में फिर है दिन - रात।     

कबीर ने  अपने गुरु को चेला बनाया .

एक बार कबीरदास को उनके गुरु रामानंद ने आदेश दिया की ने कबीर में किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिये नगर में जा रहा हूँ ,तुम एक काम करना की मेरे आने तक भगवान को कपडे में बांध कर ले जाओ और गंगा जी के स्नान करवा कर ले आना। 

कबीर ने कहा जो आपकी आज्ञा गुरुदेव :-  गुरु जी ने कबीर को मूर्तियाँ दे दी और कहा की जाओ स्नान करवा का ले आओ। कबीर जी मूर्तियों को लेकर गंगा जी के तट पर चले गए। और गुरु जी नगर में चले गए। 

जब गुरु जी कार्य पूरा करके आश्रम में आये तो अपने शिष्यों से पूछा की - कबीर कहाँ है ?

शिष्यों ने कहा -गुरुदेव कबीर तो गंगा के तट पर भगवान् को स्नान करवाने के लिए ले गया। 

गुरु जी ने कहा अरे कबीर अभी तक गंगा तट से नहीं आया ! जाओ जाकर उसे बुलाकर लाओ कहना गुरुदेव बुला रहे है। 

शिष्य कबीर लेने के लिए गंगा तट पर गए और कहा की - तुम्हे गुरु जी बुला रहे है। कबीर ने कहा - अभी भगवान को स्नान करवाने के बाद आ रहा हूँ । 

शिष्यों  ने गुरु रामानंद से आकर सब हाल सुनाया। 

रामानंद जी स्वयं कबीर के पास गंगा तट पर गए उन्होंने कबीर से कहा - कबीर यहाँ क्या कर रहे हो ?

कबीरदास ने कहा - गुरुदेव आपने ही तो कहा था की गंगा तट पर भगवान को स्नान करवाना है  ?

गुरु जी ने कहा - कहाँ है भगवान ?  कबीर दास ने कहा गुरु जी भगवान गंगा में स्नान करने गए है , तो अभी तक बहार नहीं आये , मुझे लगता है की भगवान नदी में ही डूब गए है । 

रामानंद जी ने कबीर को कहा - अरे कबीरा ये तूने क्या कर दिया भगवान को नदी में फेंक दिया । 

कबीर जी ने कहा -  गुरुदेव जब ये पत्थर के भगवान स्वयं एक नदी से नहीं निकल पाए तो आपको और मुझे भवसागर से कैसे पार लगाएंगे। 

इस बात पर कबीर जी और उनके गुरु रामानंद में बहस छिड़ गयी। 

गुरु ने कहा तुमने भगवान का अपमान किया है । भगवान तुम्हे दंड देंगे । कबीर ने कहा गुरु देव मेने भगवान का अपमान नहीं किया है ,मै आपको समझा रहा हूँ की ये पत्थर की मूर्ति भगवान नहीं है।

घट बिन कहूँ ना देखिये राम रहा भरपूर ,
जिन जाना तिन पास है दूर कहा उन दूर। 


भगवान तो आपके घट (शरीर) में विराज मान है। आपको अपने घट की भक्ति करनी चाहिए और अपनी आत्मा में परमात्मा की खोज करना चाहिए। 

इस बात पर रामानंद जी ने कबीर से प्रमाण माँगा की शरीर में भगवान का प्रमाण बताओ। 

कबीर जी ने रामानंद जी के अपने ही शरीर में भगवान के दिव्य प्रकाश के दर्शन करा दिए। 

रामानंद जी प्रकाश में ही मंत्रमुग्ध हो गये। और फिर उन्होंने कबीर जी के पैर पकड़ लिए और उनको अपना गुरु मानने लगे और कहा की आज से में तुम्हारा चेला तुम मेरे गुरु।

फिर कबीर दास जी ने सत्य का प्रचार करने के लिए अपने ही गुरु को चेला बना लिया और उनको गुरु नाम की दीक्षा दी। 

इस प्रकार कबीर जी ने अपने ही गुरु को चेला बनाया । 

कबीर ने अनेक जगह पर असत्य का विरोध किया और सत्य का प्रमाण दिया।

Sumitranandan Pant In Hindi : सुमित्रानन्दन पंत का जीवन परिचय,रचनाएँ,पुरष्कार ,कवितायेँ.

Sumitranandan Pant In Hindi : सुमित्रानन्दन पंत का जीवन परिचय,रचनाएँ,पुरष्कार ,कवितायेँ.

Sumitranandan Pant

छायावादी युग के प्रकृति के सुकुमार कवि कवि श्री सुमित्रानन्दन पंत जी हिंदी साहित्य की विचारधारा के महान कवियों के बीच एक अपनी अलग ख्याति अर्जित करने वाले एक महान कवि और जन्म से लेकर मरण तक और उसके बाद आज भी उनकी कृतियाँ उनकी याद दिलाती रहती है , की प्रकृति का वर्णन करने वाले कवियों में उनका जैसा कवि न कभी उनके पहले हुआ था और न उनके बाद कभी होगा । सुमित्रानंदन पंत जी एक मात्र ऐसे कवि है जिन्हे प्रकृति के सुकमार कवि कहा जाता है । 

उनका जीवन बहुत ही रोमांचक और कठिनाईयों से भरा और साहित्यिक था कविताओं में प्रकृति के लिए उनके मन के मर्मस्पर्शी विचार स्पष्ट रूप से दिखाई देते है । 

उनके जीवनकाल से सम्बंधित कुछ तथ्य इस प्रकार है। 

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सुमित्रानन्दन पंत का जीवन परिचय [Sumitranandan Ka Jivan Parichay]

श्री पंत का जीवन परिचय को हम कुछ भागो में विभाजित करते है । जैसे उनका जन्म - मृत्यु , शैक्षिक विकास ,उनके महान कार्य पुरष्कार,सुमित्रा नंदन पंत की कृतियाँ और कविताएँ ।  

सुमित्रानंदन पंत का जन्म : [Sumitaranandan Pant Birth]

पंत जी का जन्म 20 मई 1900 ई. में जिला बागेश्वर के कौसानी गाँव में हुआ था । उनके जन्म के 6 घंटे बाद ही उनकी माता जी ने अपने प्राण त्याग दिये थे। उसके बाद उनका पालन पोषण उनकी दादी जी ने किया था। 

पंत जी का पचपन का नाम गौसाई दत्त था। उनके पिता का नाम गंगापत्त था । और उनकी माता जी का नाम सरस्वती देवी था। नाम पंत जी अपने पिता की 8 वीं संतान थे। बचपन में ही उन्होंने अपने पिता से बहुत सारा ज्ञान अर्जित कर लिया था। उनके पिता उन्हें सबसे अधिक प्रेम करते थे ।  

सुमित्रानंदन पंत की शिक्षा : [Sumitranandan Pant  Education]

सन 1910  में सुमित्रानंदन पंत जी अल्मोड़ा में गवर्नमेंट के हाईस्कूल में शिक्षा प्राप्त करने गए थे। उन्होंने यहाँ अपना नाम गुसाई दत्त बदल दिया और बदलकर सुमित्रानंदन पंत रख दिया। 

उसके बाद 1918 में वे अपने मँझले भाई के साथ काशी में क्वींस कॉलेज में पढ़ाई करने गए। वहां से उन्होंने हाईस्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण करी फिर इलाहाबाद में म्योर कॉलेज में पढ़ने चले गए। 

जब 1921 में असहयोग आंदोलन चल रहा था तब महात्मा गाँधी के द्वारा अंग्रेजी स्कूलों ,महाविद्यालयों ,न्यायालयों और दूसरे सरकारी कार्यालयों का बहिष्कार किया गया । जिसके बहिष्कार के आवाहन के चलते उन्होंने अपनी महाविद्यालय से पढ़ाई छोड़ दी और अपने घर पर भी अंग्रजी भाषा और बंगला साहित्य ,संस्कृत हिंदी साहित्य आदि पर अध्यन शुरू कर दिया। और इस प्रकार उन्होंने अपनी शिक्षिक योग्यता हासिल की। 

पंत जी के जीवन का संघर्ष और कार्य : [Sumitranandan Pant Struggle In Life]

इलाहाबाद में ही पंत जी की काव्य चेतना जाग्रत हो गयी थी उसका विकास शुरू हो चूक था। कर्ज से जूझते हुए उनके पिता जी ने प्रांत त्याग दिए। और फिर कुछ वर्षो तक उनको बहुत ही आर्थिक संकट आये और उनका  सामना करना पड़ा। 

अपने पिता के कर्ज को चुकाने के लिए उनको अपने घर और जमीन को भी बेचना पड़ गया। इन परिस्थितियों में मार्क्सवाद की तरह आकर्षित हुए। कुंवर सुरेश सिंह के साथ वे 1931 में प्रतापगढ़ के कालाकांकर में रहने चले गए और कुछ वर्षो तक अपना जीवन वही पर व्यतीत किया। 

उन्होंने महात्मा गाँधी के सानिध्य में रहकर आत्मा प्रकाश का और अंतर आत्मा का अनुभव किया। उनके द्वार 1938 में प्रगतिशील मासिक पत्रिका का 'रूपाभ" का संपादन किया गया। 

1950 से 1957 तक वे परामर्शदाता के रूप में आकशवाणी में कार्यरत रहे। 

सुमित्रानंदन पंत की कृतियाँ और पुरष्कार: [Awards of Sumitranandan Pant]

1926 मे पंत जी अपने प्रसिद्ध काव्य संकलन "पल्लव "  का प्रकाशन किया। 1958 में पंत जी की कृति  " युगवाणी " से उन्होंने " वाणी " काव्यों के संग्रह के लिए कविताओं का संकलन प्रकाशित किया जिसका नाम " चिदंबरा " रखा गया। 

इसके लिए उनको 1968 ज्ञानपीठ के पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनको सोवियत लैंड नेहरू पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया था। 

1960 में उन्होंने अपने काव्य संग्रह " कला और बूढ़ा चाँद  " के लिए साहित्य अकादमिक पुरस्कार प्राप्त किया। 1961 में उन्हें पद्मभूषण की उपाधि से सम्मान दिया गया। 1964 में उन्होंने अपने विशालकाय महाकाव्य "लोकायतन" को प्रकाशित किया। 

उसके बाद उन्होंने अपने जीवनकाल में अनेक काव्य संग्रहों का प्रकाशन किया। पुरे जीवन काल तक वे अपनी रचनाओं की रचना करते रहे । 

सुमित्रानंदन पंत जी ने विवाह नहीं किया था उन्होंने ने नारी के प्रति मात्र भाव से ही उनका आदर किया। 

सुमित्रानंदन पंत की कुछ अन्य कृतियाँ भी है : 

जैसे :- स्वर्णकिरण ,सत्यकाम ,कला और बूढ़ा चाँद ,युगांत ,ग्रन्थि ,लोकायतन ,ग्राम्या , स्वर्णधूली ,गुंजन ,चिदंबरा,ज्योत्सना नामक रूपक। 

प्रमुख कविताये : 

तारपथ ,परिवर्तन ,मधुज्वाल ,खादी के फूल । 

पंत जी ने अपने जीवनकाल में अपनी 28 पुस्तकों का प्रकाशन किया। 



Sumitranandan Pant Kavita

Sumitranandan Pant Kavita
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सुमित्रानंदन पंत की विचार धारा : [Sumitranandan Pant Thoughts]

पंत जी का जीवन का सम्पूर्ण साहित्य ' सत्यम शिवं सुंदरम  ' के आदर्शो से प्रभावित था। 

उन्होंने अपने प्रारंभिक जीवन काल में प्रकति के सौंदर्य का भलीभांति एवं अद्भुत वर्णन अपनी कविताओं में किया। और प्रकृति के सुकुमार कवि के नाम से प्रख्यात हुए।  

उसके बाद उन्होंने अपने दूसरे चरण की कविताओं का रुख छायावाद की तरफ मोड़ दिया। सूक्ष्म कल्पनाओ और भावना का वर्णन अपनी कृतियों में किया। 

अपनी अंतिम चरण की कविताओं में प्रगतिवाद और विचारशीलता का प्रमाण दिया । पंत जी प्रगतिवादी और आलोचकों एवं प्रयोगवादियों के सामने कभी नहीं झुके। 

उनका यही कहना था की " गा कोकिला सन्देश सनातन ,मानव का परिचय मानवपन।  " 

सुमित्रानंदन पंत जी की मृत्यु : [Death of Sumitranandan Pant]

पंत जी ने अपने जीवन काल में निरंतर अपने कार्यं में निष्काम कर्मयोगी की तरह रत हिंदी साहित्य को बहुत सारे काव्य और कृतियाँ देकर हिंदी साहित्य पर बहुत बड़ा उपकार किया है ।

उन्होंने अपने जन्म से लेकर देहावसान तक 77 वर्ष ,7 माह और 8 दिनों का जीवनकाल को गुजारा है। 

अंत में प्रकृति के सुकुमार कहे जाने वाले इन महान कवि ने 28 दिसम्बर 1977 में अपने प्राणो को भगवान के चरणों में अर्पित किया और प्रकति की गोद में सदा के लिए सो गए। 



Prakrati ke sukamuar kavi


panchatantra short moral stories in hindi | पंचतंत्र की नैतिक कहानी

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Panchatantra Short Moral Stories In Hindi

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अकल मंद हंस [ Panchatantra Short Moral Stories In Hindi  ]



एक जंगल बहुत बड़ा बरगद का पेड़ था । उस पेड़ पर बहुत सारे हंसो का एक झुंड  रहता था । उस झुण्ड में एक बहतु ही स्याना हंस था , वह बहुत  चतुर और बुद्धिमान था ।  सभी हंस  उसका सम्मान करते थे तथा उसको 'ताऊ' कहकर बुलाते थे ।

एक दिन उसने देखा की एक छोटी सी बेल पेड़ के तने सी लिपट रही है। उसने  ने अन्य  हंसो को बुलाकर कहा देखो हमें  ,इस बेल को तुरंत ही नष्ट कर देना चाहिए । क्योंकि यही  बेल एक दिन हम सबको मौत के मुंह मे ले जा सकती है ।

एक युवा हंस हँसते हुए बोला 'ताऊ' आप पागल हो गए हो क्या ?  यह छोटी-सी बेल हमें मौत के मुंह मे कैसे  ले जा सकती है ?

ताऊ  ने समझया " आज तुम इसे छोटी सी समझ रहे हो  । धीरे - धीरे यह  बड़ी होकर पेड़ के सारे तने को लपेटा मारकर ऊपर तक आयेगी । बेल धीर - धीरे मोटी होने लग जाएगी और पेड़ से चिपकने लग जाएगी  , तब नीचे से ऊपर तक पेड़ पर चढ़ने के लिए बेल  एक सीढ़ी  का काम कर सकती है । कोई भी शिकारी सीढ़ी के सहारे चढ़कर हम तक पहुँच सकता और हमें मर सकता है ।

दूसरे हंस को  यकीन ना आया ,उसने  कहा की एक छोटी सी बेल कैसे सीढ़ी बनेगी ?

एक अन्य  हंस बोला ताऊ तुम एक छोटी सी बेल को न जाने क्यों फांसी का फंदा समझ रहे हो "

एक हंस  बड़बड़ाया यह ताऊ अपनी अकल का रौब डालने के लिए अंड - संड कहानी बना रहा है

इस प्रकार किसी  भी दूसरे हंस ने ताऊ की बात को गंभीरता से नहीं लिया। क्योकि इतनी आगे की सोच रखने की  उनमें अकल कहां थी?

समय बीतने लगा बेल धीरे धीरे लम्बी हो गयी। और एक दिन बेल पेड़ के तने के सहारे शाखाओ तक पंहुचा गयी। बेल का तना मोटा होआ गया। इस प्रकार पेड़ के तने पर सीड़ी बन चुकी थी। सभी हंसो को ताऊ की बात सच होते प्रतीत होने लगी।

एक दिन सभी हंस पेड़ से दूर दाना चुगने के लिए गए। तभी वहाँ पेड़ के पास से एक शिकारी  गुजर रहा था। जब उसने देखा की पेड़ बार बेल से एक सीड़ी बानी हुयी है। उसने सोचा जरूर इस पेड़ पर कोई पक्षी रहते होंगे। उसने उनको पकड़ने के लिए पेड़ पर जाल बिछा दिया और वहां से चला गया।

शाम होते ही जब सारे हंस दाना चुग घर पेड़ पर आये तो वे शिकारी के बिछाए गए जाल ने बुरी तरह फास गए। उन्हें ताऊ की बात न मानने का बहुत पछतावा हुआ। और ताऊ से माफ़ी मांगने लगे। ताऊ तो उन सब से मुँह फुलाकर अलग थलग बैठा हुआ था।


वे सब उस बड़े हंस ( ताऊ  ) से कहने लगे ताऊ आज अगर हम आपकी बात मन लेते तो इस संकट में न फसते लेकिन आपकी बात न मानकर हमने बहुत बड़ी भूल कर दी है।

अब तो ताऊ तुम ही कुछ करो नहीं तो हम सब मारे जायेंगे। हमे बचाने के लिए तुम जो भी सुझाव दोगे हम मानेंगे , और आगे से कभी भी तुम्हारी हर बात मानेंगे । कैसे भी कर के हमें बचा लो।

ताऊ ने कहा - ठीक है । मैं तुम्हे बचने का उपाय बताता हूँ । सुबह जब शिकारी हमें लेने आएगा तो तुम सब मुर्दा होने का नाटक करना वह शिकारी तुम्हे मार हुआ समझ कर जाल से निकालकर जमीन पर फेंक देगा । जमीन पर भी मुर्दा बनकर पड़े रहने का नाटक करना ।

जब बेहलिया सभी हंसो को बाहर निकल देगा । तब मै सिटी बजाऊंगा और तुम सब उड़ जाना इस तरह तुम्हारी जान बच सकती हे। सब हंसो ने हामी भर दी।

सुबह जब बहेलिया आया तो उसने देखा की सभी हंस मुर्दा पड़े है। उसने हंसो को मरे हुए समझ कर जमींन पर फेंक दिया। और जैसे ही उसने अंतिम हंस को जाल से बाहर निकालकर जमींन पर फेंका। ताऊ ने सिटी बजा दी। और सारे हंस उड़ गए। बहेलिया देखता हि रह गया। और हंसो की जान बच गयी।

कहानी से सीख :- बड़े - बुजुर्गो और बुद्धिमानों की बातो को गंभीरता पूर्वक लेना चाहिए। क्योकि उन्हें अनुभव होता है।

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घंटिधारी ऊँट [ Panchatantra Short Moral Stories In Hindi  ]


एक बार की बात है एक संभलपुर गांव में एक दर्जी रहता था। वह बहुत ही मेहनती और ईमानदार व्यक्ति था। लेकिन वह गरीब था। जब उसकी शादी हो गयी तो उसका घर का खर्चा भी बड़ गया । उसकी पत्नी भी बहुत ही शुशील और बुद्धिमान थी। 

जब गांव में अकाल पड़ने लगा तो उनके खाने पीने के भी लाले पड़ने लग गए। तब उसकी पत्नी ने सुझाव दिया की हम शहर जा कर  काम करेंगे। उसने पत्नी की बात मान ली ,और वे दोनों गांव से शहर चले गए।

शहर में रहकर उन्होंने कुछ  छोटे -  मोटे काम किये और उनके बदले में उन्हें पैसे मिलने लग गए। वे शहर में जाकर बहुत ही सुखी हो गए थे लेकिन उन्हें गांव  की याद बहुत सताती  थी।  जब उनके पास कुछ पैसे इकट्ठे हो गए तो , गांव से खबर आयी की अकाल समाप्त हो गया है। 

वो लोग शहर से गांव की और रवाना हो गए रास्ते में चलते -चलते उन्हें एक ऊँटनी दिखाई दी। वह ऊंटनी बहुत ही बीमार प्रतित हो रही थी , और वह गर्भवती भी थी।  थी दर्जी को उस ऊंटनी पर दया आ गयी।  

वह उसे अपने साथ गांव ले गया। और उसकी देखभाल करने लगा। कुछ ही दिनों में अच्छी खान - पान के कारण वह ऊंटनी पूरी तरह से स्वस्थ हो गयी।  और उसने प्रसव करके एक ऊंट के बच्चे को जन्म भी दिया। 

वह ऊंट का बच्चा मनो अपने साथ दर्जी का भाग्य ले कर आया हो। ऊंट के बच्चे के आते ही उसके सभी काम आसानी से सम्पूर्ण हो जाते और किसी भी प्रकार की समस्या भी नहीं होती थी।

उस गांव में एक चित्राकर गांव की जीवन शैली पर चित्रकला करने आया था।  जब उसे पेंटिंग करने के लिए ब्रुश की आवश्यकता होती तो वह। दर्जी के घर जाकर। उस ऊंट के बच्चे की दुम के बाल लेकर उसका ब्रुश बना लेता था।  और चित्रकला करता था। कुछ् दिन चित्रकला करने के बाद वह चित्रकार गांव से चला गया।

वह ऊंटनी भी बच्चे को जन्म देने के बाद बहुत दूध देने लग गयी।  वह दर्जी उस दूध को बेच कर पैसे कमाने लग गया ।   जिससे उसको मोती रकम प्राप्त होने लग गयी।

एक दिन उस गांव में वह चित्रकार आया और उस दर्जी को बहुत सारे पैसे देकर चला गया । क्योंकि उसके बनाये हुए चित्रों से उसे बहुत सारे पुरस्कार प्राप्त हुए। वह दर्जी उस ऊंट के बच्चे को अपने भाग्य का सितारा समझने लगा।  उसने बाजार से एक सुन्दर सी घंटी लाकर उस ऊंट के बच्चे के गले में पहना दी और उसे बहुत ही प्यार करने लग गे।

ऊँटो के कारण उसका व्यापार बढ़ने लगा। तो उसने सोचा की क्यूँ न में इस दर्जी के काम को छोड़कर ऊँटो का व्यापार करने लग जाऊँ । उसकी पत्नी ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलायी । उसकी पत्नी भी गर्भवती हो गयी थी। और अपने इस सुख की अवस्था के लिए ऊँटनी का आभार प्रकट करती।

दर्जी ने कुछ और ऊँट खरीद लिए और दर्जी का काम छोड़कर ऊँटो का व्यापार करने लग गया । ऊँटो को देखते ही देखते उसने बहुत सारे ऊँटो को एक टोली बना ली।  अब उसके पास बहुत सारे ऊँट हो आगये थे।

ऊँटो को चरने के लिए दिन के समय जंगल में छोड़ दिया जाता और शाम होते ही ऊँट भी घर को आ जाते।

अब ऊँट वह बच्चा घंटीधारी भी बड़ा हों गया । लेकिन वह बहुत ही घमंडी स्वभाव का था।  वह अपनी टोली से अलग कुछ दुरी पर रहता था और दूसरे ऊँटो कहता की मै मालिक का दुलारा हूँ । मालिक मुझे सबसे अधिक प्रेम करते है।

उसी जंगल में एक शेर रहता था। ऊँटो के झुंट को देखकर वह उन्हें अपना शिकार बनाने की ताक में लगा रहता था। और घंटी वाले ऊँट को सबसे अलग देखता रहता था । एवं घंटी होने के कारण शेर को पता भी चल जाता की यह वही ऊंट हे जो सबसे अलग रहता है। शेर ने उसे मारने की ठान ली थी। 

" शेर जब भी झुण्ड में किसी का शिकार करता है , तो वह झुण्ड में सबसे अलग एवं झुण्ड से दूर वाले जानवर को  ही अपना शिकार बनाता है। " 

जब शाम हुयी तो सभी ऊँट रास्ते से घर को जा रहे थे , क्यूंकि शेर तो शिकार के लिए पहले ही छुप कर बैठा था।
घंटीधारी ऊँट अपने घमंड के कारण अपने झुण्ड से 20 मीटर की दुरी पर पीछे चला रहा था।  जैसे ही शेर ने उसे झुण्ड से अलग देखा और शेर ने उस पर हमला कर दिया और उसे मार दिया। इस प्रकार वह ऊंट अपने साथियो से अलग होने के कारण  मारा गया।

कहानी से सीख :- " स्वयं को दुसरे से श्रेष्ठ समझने वाले का अहंकार के  कारन विनाश ही होता है ,इसलिए कभी भी अपने साथियों में ख़ुद को श्रेष्ठ नहीं समझना चाहिए। और अपने हितेषियों से कभी दुरी नहीं बनानी चाहिए। "  


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तीन मछलियाँ  [ Panchatantra Short Moral Stories In Hindi  ]


एक नदी के किनारे एक छोटा सा तालाब था जो नदी से ही जुड़ा हुआ था . तालाबो का पानी गहरा होता है उस तालाब में काई एवं कई प्रकार के सूक्ष्म जिव जंतु रहते थे एवं जलिय पौधे भी उगते थे , जिन्हें मछलियाँ अपना प्रिय भोजन बनाती थी। मछलियाँ नदी से तालाब और तालाब से नदी में तैरती रहती थी । क्योंकि तालाब लम्बी झाड़ियो वे घास से घिरा हुआ रहता था । अत: वह मछुआरो की नजर में नहीं रहता था। 

उसी तालाब में तीन मछलियों का एक झुण्ड रहता था ।  वे तीनो मछलियाँ साथ में ही रहती थी ,परन्तु  उनके  विचार एक दुसरे से भिन्न थे । 

अन्ना  मछली का मानना था की किसी भी संकट के आने से पहले ही उसका समाधान एवं बचने का उपाय कर लेना चाहिए । ताकि हम पहले ही संभलकर अपने संकट को टाल दे । उसका इसी बात में विश्वास था की संकट को आने से पहले ही टाल देना चाहिए।

प्रत्यु मछली का संकट के विषय में ऐसा मत था की संकट के बारे में  पहले ही सोचकर स्वयं  को चिंता में नहीं डालना चाहिए । क्योकि चिंता चिता के समान है । उसका मानना था की जब भी संकट आये तब उसी समय संकट को तलने का उपाय सोचना चाहिए । और उसी समय संकट को टालना चाहिए । और अपनी बुद्धि का उपयोग करना चाहिए।

याद्दी मछली की सोच दोनों मछलियों से अलग थी वह। कभी संकट से निपटने के बारे में नहीं सोचती थी । उसका मानना था की कुछ भी तैयारी करने और संकट के बारे में सोचने से कुछ नहीं होता है। जो भाग्य में होता है , वही होता है। होनी को कोई नहीं टाल सकता।

एक दिन कुछ मछुआरे नदी से मछलियों को पकड़ कर घर जा रहे थे । वो बड़े निराशा लेकर जा रहे थे क्यूंकि उनको उस दिन मछलियाँ कम मिली थी ।  तभी उन्हें मछली खाने वाले पक्षियों का झुण्ड दिखाई दिया और सभी पक्षियों के मुह ( चोंच ) में मछलिया  थी।  एक मछुआरे ने बोला जरुर उन झाड़ियो के बीच में कोई तालाब या जलाशय है ।

मछुआरे झाड़ियो से हो कर तालाब के किनारे आ गए । और उन्होंने उस जलाशय में बहुत साड़ी मछलियाँ देखि तो उनका खुशी का ठिकाना न रहा। एक मछुआरा -  बोला देखो ! कितनी मछलियाँ है ।  अब हम इसे पकड़ लेते है।

तभी दुसरे मछुआरे ने कहा आज तो शाम बहुत हो गयी है ।  हम कल आयेंगे और सभी मछलियों का पकड़ लेंगे।
वहां से वे दुसरे दिन का प्रोग्राम जमा कर चले गए। मछुआरो की बात उन तीनो मछलियों ने सुन ली थी।

उन्होने अपने - अपने मत रखे ।

अन्ना मछली ने कहा - की संकट आने वाला हे हमारा यहाँ रहना खतरे से खाली नहीं है   मै तो संकट आने से पहले ही नहर के रास्ते से नदी में जा रही हूँ ताकि में बच सकूँ।

प्रत्यु मछली ने कहा - चिंता मत करो अभी कहाँ संकट आ गया है , में तो यहीं रहूंगी ,जब संकट आएगा तब सोचूंगी।  हो सकता है वो मछुआरे आये ही ना उनकी जाल फट सकती है , उनके गाँव में भूचाल भी आ सकता है , हो सकता है उनमे से किसी की मौत हो जाये , की मै जाल में ही ना फसूं। और वह नदी में नहीं गयी।

यद्दी मछली ने कहा - की हमारे इसे भागने और विचार करने से कुछ नहीं होगा।  अगर मछुआरो को आना हे तो आयेंगे और हमारे भाग्य में मरना लिखा है ,तो हम मारे जायंगे । इसका कोई कुछ नहीं कर सकता।

इस प्रकार अन्ना मछली तो जलाशय को छोड़कर चली गयी एवं  प्रत्यू और यद्दी वहीँ जलाशय में ही रही।

जब सुबह हुई तो मछुआरे जलाशय पास आये और मछलियों को पकड़ने के लिए अपना जाल फैलाया। और जलाशय में फेंक दिया । प्रत्यु ने संकट को देखा और अपनी जान बचाने के उपाय सोचने लगी।

उसे जलाशय में बहुत दिनों से मरे हुए उदबिलाव की  लाश याद आई और उसने सोचा की यही लाश मेरे बचाव के काम आ सकती है।  वो जल्दी से उस उदबिलाव के पेट में घुस गयी उसकी लाश साद चुकी थी इसलिए उसमे से बदबू आ रही थी।  प्रत्यु ने लाश की सड़ांध को अपने ऊपर लपेट लिया और फिर पेट से बाहर निकल गई।

थोड़ी ही देर में प्रत्यु मछुआरे के जाल में फंस गयी।  मछुआरे ने अपना जाल जमीन पर उलट दिया। बाकि सभी मछलियां तो तड़प रही थी लेकिन प्रत्यु मरी हुई मछली की तरह पड़ी रही।

मछुआरे को सडांध की बदबू की भभक लगी ।  तो उसने देखा की सभी मछलियाँ तड़प रही है केवल एक ही मरी पड़ी है। उसने सोचा की यह मछली तो पहले से ही मरी हुई है। और उसने बडबडाते हुए प्रत्यु मछली को पाने में फेंक दिया।

 अन्ना अपनी समझदारी से और प्रत्यु ने अपनी बुद्धि का उपयोग करके अपनी जान बचा ली। पानी में गिरने के तुरंत ही उसने गोता लगाया और सुरक्षित गहराई में पहुचकर जान बचाई।

यद्दी मछली भी दुसरे मछुआरे के जाल में फंस गयी लेकिन।  भाग्य के भरोसे बेठने वाली यद्दी मछली अपने आप को बचा न सकी और अंत में दूसरी मछलियों के जैसे पानी से बहार तड़प - तड़प कर अपनी जान दे दी।

कहानी से शिक्षा :- संकट से पहले समझदारी और बुद्धि से काम लेने वालो का संकट टल जाता है किन्तु हाथ पर हाथ रखकर भाग्य के भरोसे बेठेने वाले का हमेशा विनाश ही होता है।  इसलिए हमेशा कर्म करना चाहिए भाग्य के भरोसे कभी नहीं बैठना चाहिए। 


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बुद्धिमान सियार [ Panchatantra Short Moral Stories In Hindi  ]


एक समाय की बात है जंगल में एक शेर रहता था। वह शेर बहुत ही भयंकर था। वह छोटे-छोटे जानवरो को तो अपने पंजो से चींटी की तरह मार देता था। 

कुछ समय तक ऐसा ही चलता रहा वह जानवरो को  मारता रहा हो जंगल से जानवर काम होते जा रहे थे। कुछ जानवरो ने मिलकर मीटिंग बनायीं की हम शेर को कैसे भी करके अपने जाल में फसा लेंगे। और उसके जान लेने के लिए षड्यंत्र करने लग गए।

उन्होंने शेर को मारने ले किये एक कुए का सहारा लिया की जैसे ही शेर किसी जानवर को पकड़ने आएगा तो जानवर अपनी जगह से हैट जाएगा और शेर कुए में गिर जाएगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ । 

जब इस कार्य के लिए एक हिरन को चुना गया तो हिरन ने मना  कर दिया की मैं यह नहीं कर पाउँगा लेकिन सभी जानवरो ने हिरन को समझाया की तुमसे अच्छा जानवर इस जंगल में कोई नहीं है। 

तुम बहुत खूबसूरत इसलिए शेर को हिरन का शिकार करना बहुत पसंद है इसलिए तुम्हे ही शेर के सामने कुए के पास खड़े रहना होगा जैसे ही शेर तुम पर हमला करे तुम अपनी जगह से हट जाना और शेर कुए में गिर जाएगा। 
इस प्रकार हम सब जानवरो की रक्षा हो सकेगी । एक दिन जब शेर शिकार पर निकला तो उसने एक सुन्दर से हिरन को कुए के पास देखा ,जब हिरन ने उस खूंखार शेर को देखा तो डर के मारे उसे कुछ समझ नहीं आया। 

शेर जैसे ही हिरन पर झपटा हिरन की हटने की गति दर के कारण काम हो गयी और शेर ने हिरन को पकड़ लिया । इसलिए डर जाने के कारण हिरन अपने कार्य को सिद्ध नहीं कर उसका और शेर ने उसका शिकार कर लिया। 

अब आगे : -  

कुछ दिनों तक फिर से ऐसा ही चलता रहा । एक दिन जब शेर  जब हिरणो के झुण्ड पर  करने के लिए दौड़ा तो शेर के पँजे में कांटा चुभ गया जो बहुत कोशिश करने के बाद भी शेर से नहीं निकला और शेर लँगड़ा हो गया । 

अब शेर को शिकार करने में बहुत परेशानी होने लगी धीरे - धीरे शेर का दौड़ना भी मुश्किल हो गया।  शेर भूख के मारे बहुत कमजोर हो गया था अब वह केवल चल पाता था।  छोटे -छोटे जानवर भी शेर के पास आ जाते थे लेकिन वह कुछ नहीं कर पाता था । 

एक दिन शेर शिकार की तलास करते - करते एक गुफा के पास पहुँच गया। भूख से लाचार शेर उसी गुफा में यह सोचकर छुपकर बैठ गया की जरूर यहाँ कोई जानवर रहता होगा । शेर अब चल भी नहीं सकता था । 

उस गुफा में सच  में एक सियार रहता था ,जब वह जंगल से घूमकर शाम को जब गुफा के पास आता है तो उसे शेर के पंजो के निशान दिख जाते है। 

सियार बहुत होशियार था , वह गुफा में अंदर नहीं गया और बाहर से ही आवाज लगाने लगा की '' गुफा रानी ओ गुफा रानी लो में आ गया " , ' आज मुझे अंदर नहीं बुलाओगी क्या ? ' , '' तुम्हारी और मेरी बात हुयी थी की अगर तुम मुझे नहीं बुलाओगी तो में तुम्हे छोड़कर कहीं और चला जाऊंगा  ' ,तो ठीक है में जा रहा हूँ। 

शेर ने यह सुनते ही सोचा की सच में यह गुफा इस सियार को अंदर बुलाती होगी । शेर ने आवाज बदलकर अंदर से आवाज लगायी की सियार राजा जल्दी अंदर आओ में कब से तुम्हारा इंतजार कर रही हूँ। 

सियार ने यह सुना और वह समझ गया की अंदर शेर बैठा है ,वह वहाँ से दूर चला गया। और भूख में शेर ने उसी गुफा में दम तोड़ दिया और मर गया । 

इस प्रकार सियार ने होशियारी से अपनी  जान बचा ली।  

कहानी से शिक्षा :- " हिरन की तरह डर कभी भी अपने साहस को नहीं खोना चाहिए बल्कि  सियार की तरह  संकट के समय अपनी बुद्धि का उपयोग कर के  अपना काम करना चाहिए  

[Best] Inspirational stories in hindi | लकड़ी का कटोरा - बूढ़े पिता की कहानी |

[Best] Inspirational stories in hindi | लकड़ी का कटोरा - बूढ़े पिता की कहानी |

 Inspirational Stories In Hindi

लकड़ी का कटोरा

एक वृद्ध व्यक्ति अपने बहु - बेटे के यहाँ शहर रहने गया।  उम्र के इस पड़ाव पर वह अत्यंत कमजोर हो चूका था , उसके हाथ कांपते थे और दिखाई भी कम देता था ।

वो लोग एक  छोटे से घर में रहते थे , बुजुर्ग सहित पूरा परिवार और उसके बेटे का चार वर्षीया पोता एक ही डिनर टेबल पर साथ में खाना खाते थे । लेकिन वृद्ध होने के कारन उस व्यक्ति को खाना खाने में बड़ी परेशानी  होती थी।

कभी कभी तो मटर के दाने उसकी हाथ कांपने के कारण चम्मच से निकल कर फर्श पे बिखर जाते तो कभी हाथ से दूध छलक कर मेज पोश पर गिर जाता था ।  बहू - बेटे यह सब  एक -दो दिन ये सहन करते रहे पर कुछ ही दिनों में  उन्हें अपने पिता के इस काम से चिढ़ होने लग लगी।

Inspirational stories in hindi
Inspirational stories in hindi

"हमे इनका कुछ  तो  करना होगा " , लड़के ने अपनी पत्नी से कहा । उसकी पत्नी  ने भी उसकी हाँ में हाँ मिलाई और बोली " आखिर कब तक इनकी वजह से हम अपने खाने का मज़ा किरकिरा करेंगें ।


और हम इस तरह चीजो का नुकसान होते हुए भी नही देख सकते है"। अगले दिन जब रात को खाना  खाने का समय  हुआ तो लड़के ने एक पुरानी सि मेज को कमरे के कोने में रख दिया ।

अब बूढ़े पिता को वही बैठ कर भोजन करना था । यहाँ तक कि उन्हें अपने खाने के बर्तनों की जगह लकड़ी का कटोरा भी दे दिया गया । ताकि अब और कोई बर्तन टूट - फुट न सके ।

बाकी लोग पहले की तरह ही आराम से बैठ कर खाते और जब कभी - कभार उस बुजुर्ग को देखते तो उनकी आँखों मे आँसू ही दिखाई देते ।

यह देखकर भी बहू- बेटे का मन नही पिघलता , वो उनकी छोटी से  छोटी गलती पर उन्हें ढेरो बाते सुना देते ।

वहाँ बैठा बालक भी यह सब बड़े ध्यान से देखता रहता था , और अपने आप में ही मस्त रहता था । एक रात खाने से पहले उन माता पिता ने उस बालक को ज़मीन पर बैठ कर कुछ करते हुये देखा, " तुम यह क्या बना रहे हों ? " , पिता ने पूछा।

उस छोटे से बच्चे ने मासूमियत भरी आवाज  के साथ उत्तर दिया की , अरे में तो आप लोगो के लिए एक अच्छा सा लकड़ी का कटोरा बना रहा हूँ । ताकि जब में बड़ा हो जाऊं तो आप लोग इसमे अच्छे से खाना खा सके  , ओर वह पुनः अपने काम मे रत हो गया ।

पर इस बात का उसके माता - पिता पर गहरा असर हुआ , उनके मुँह से एक भी शब्द नही निकला और आँखों से आँसू बहने लगे ।

उन दोनों को बिना बोले ही समझ में आ चूका था कि अब उन्हें क्या करना है । उस रात उन्होंने अपने  बूढ़े माता - पिता को पुनः उस डिनर टेबल पर खाने  के लिए ले  आये ।

और फिर कभी उनके साथ अभद्र व्यवहार नहीं किया ।

कहानी से सिख :- इसलिए हमें कभी भी अपने घर में माता - पिता के साथ और ऐसे भी अभद्र एवं अनुचित व्यव्हार नहीं करना चाहिए यही सब देख कर छोटे बच्चे भी सीखते है , और दुर्व्यवहार करते है ।

बच्चो के लिए अच्छी - अच्छी कहानियाँ - stories in hindi for kids

बच्चो के लिए अच्छी - अच्छी कहानियाँ - stories in hindi for kids

Stories In Hindi For Kids 

1. बिल्ली कैसे पालतू जानवर बनी ? ( cat story in hindi for kids)

Stories In Hindi For Kids
Stories In Hindi For Kids 

बहुत समय पहले एक बिल्ली जंगल में रहती थी। वह हमेशा शक्तिशाली जानवरो से मित्रता करना चाहती थी। 

एक बार उसने देखा की सभी जानवर शेर से डरते है ,इसलिए उसने शेर से मित्रता कर ली। एक बार वह शेर के साथ रही थी। सभी जानवरों व  शेर  ने हाथी के लिए रास्ता साफ किया। 

बिल्ली ने सोचा की हाथी शेर से अधिक शक्तिशाली है।  इसलिए वह हाथी की मित्र बन गई। एक दिन हाथी चिंघाड़कर बोला ,"यहाँ शिकारी आ गए है " और वह वहाँ से भाग गया।  बिल्ली ने सोचा की शिकारी हाथी से ज्यादा ताकतवर है। 

इसलिए वह एक शिकारी के साथ शहर  चली गई। वह शिकारी बिल्ली को अपने घर ले गया। शिकारी की पत्नी बिल्ली को देखकर नाराज हुई। 

तभी चूहां पत्नी के पास से गुजरा।  शिकारी की पत्नी चूहे को देखकर जोर से चिल्लाई। बिल्ली ने दौड़कर चूहें को पकड़ लिया और मारकर खा गई।  शिकारी की पत्नी चूहें से छुटकारा पाकर बहुत प्रसन्न हुई।  

उसने बिल्ली को  अपना पालतू बना लिया।  इस प्रकार बिल्ली एक पालतू बन कर रह गई ।  

कहानी से हमें शिक्षा :- हमें अपनी क्षमता व शक्ति के अनुसार ही लोगो सी मित्रता करनी चाहिए अन्यथा हमें अन्य लोगो का दास बनना पद सकता है। 


2. अंगूर खट्टे हैं । ( Fox story in hindi for kids )

Fox story in hindi for kids - stoies in hindi for kids


एक  लोमड़ी थी।  उसे बहुत भूख लगी थी।  वह भटकती हुई एक बाग में पहुँची।  वहाँ उसने बेलों पर पके  हुए बहुत - सारे अंगूर लटके हुए देखे।  अंगूर देखकर लोमड़ी की भूख और बढ़ गई। 

उसने  उछलकर अंगूर तोड़ने की सोची। वह उछली परन्तु अंगूरों तक नहीं पहुँच पाई। वह फिर उछली , परन्तु अंगूर ऊँचाई पर होने के कारण मुहँ  ही रहे।  

वह बार - बार उछलती रही अपर अंगूरों के गुच्छों को छू भी न सकी। ऐसा करते -करते वह थक गई। अपनी असफलता पर वह खीझ गई और अंत में वह बोली - "ये अंगूर खट्टे है।  अगर मैं इन्हे खाती तो बीमार  पड़ जाती। "  

ऐसा कहकर उसने अपने मन को दिलासा दे दिया और वहाँ से दुखी होकर चली गई। 

कहानी से शिक्षा :-  हमें अपनी असफलता से कभी दुःखी नहीं होना चाहिए ।  


चाणक्य नीति  के अनुसार मनुष्य के 4 गुण - Four human properties by Chanakya Niti

चाणक्य नीति के अनुसार मनुष्य के 4 गुण - Four human properties by Chanakya Niti

Four Human Properties By Chanakya Niti 

Chanakya Niti
Chanakya Niti 
आचार्य चाणक्य को कौन नही जानता है । उनकी कही हुई बाते आज सिद्ध हो रही है । वे अपने जीवनकाल में जो बातें कह गए है ,वे आज प्रत्येक अपनी स्थिति के अनुसार देखने को मिलती ही ।

आचार्य चाणक्य ने  मनुष्य में 4 गुण प्राकतिक रूप से  विद्यमान बतायें है ।
जो मनुष्य को सीखा नही सकते । वे उसके अंदर ही जन्म से विद्यमान रहते है।

1. दान ( Charity )


यह मनुष्य का एक ऐसा गुण है ,जिसे सिखाया नही जा सकता है। यदि मनुष्य में यह गुण नही हैं। तो उसके पास तीनों लोक जितनी सम्पती होने के बाद भी वह किसी को दे नही सकता (दान नही कर सकता ) मनुष्य को स्वयं ही यह गुण अपने अन्दर उत्पन्न करना होता है । कोई और नही कर सकता  है ।


2. धैर्य ( Patience )


मनुष्य में धैर्य का गुण उसकी इच्छा इच्छाशक्ति के अनुसार होता है । यदि मनुष्य की इच्छा शक्ति प्रबल है तो वह किसी भी कार्य ,वस्तु ,या विषय के लिए धैर्य कर सकता है । और उसका उचित लाभ ले सकता है ।

अगर उसकी इच्छाशक्ति कमजोर है तो वह किसी वस्तु ,विषय को पाने में धैर्य नही रखेगा । उसका धैर्य का बांध टूट जाएगा । और यही बाँध उसको डुबा देगा । यही उसके पतन का कारण बन सकता है ।

इसलिए किसी भी कार्य मे जल्दबाजी नही करनी चाहिए ।

3. फ़ैसला लेनें की क्षमता ( Decision Making Power )


किसी भी मनुष्य में एक उचित फ़ैसला लेने की क्षमता का गुण होना जरुरी है । लेकिन यह गुण बाहर से हम किसी व्यक्ति में नही डाल सकते है । यह मनुष्य का स्वयं का गुण होता है । जो उसके जन्म से ही उसे प्राप्त हो जाता है ।

उसे कितना भी बाहरी ज्ञान देकर सीखा दो लेकिन जब फैसला लेने का समय आता है तब वह सब भूल जाता है ।

और अपने आंतरिक गुण के अनुसार ही फ़ैसला लेता है ।

4. मधुर वाणी ( Soft Voice )


प्रत्येक मनुष्य अपने बचपन से ही बोलना सीखता है । और जब वह बोलने लग जाता है तब उसको यह नही सीखा सकते कि कैसे बोलना ही । मनुष्य की अपने वातावरण और बचपन की परवरिश के अनुसार ही भाषा एवं वाणी होती ।

मीठी वाणी का गुण सब मे होता है , लेकिन सभी मनुष्य इसे अपने जीवन मे नही उतार सकते है । वह जाने अनजाने ही किसी को बुरा भला कह सकता है ।

इसलिये कहा जाता है की -

शब्द सम्भारे बोलिये ,शब्द के हाथ न पाँव ।
एक शब्द औषधि करे ,एक शब्द करे घाव ।।

यदि मनुष्य चाणक्य द्वारा बताए गए इन गुणों को अपने जीवन मे उतारे एवं उसका उचित प्रयोग करें तो उसके जीवन मे कभी निराशा नही हो सकती ,उसे प्रत्येक जगह पर सफलता ही प्राप्त होती ।

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What is Hanta Virus Symptoms of Hanta Virus Protect From Hanta Virus - हंता वायरस क्या है इसके लक्षण बचने के उपाय। भारत मे कितना खतरा है ।

What is Hanta Virus Symptoms of Hanta Virus Protect From Hanta Virus - हंता वायरस क्या है इसके लक्षण बचने के उपाय। भारत मे कितना खतरा है ।

What is Hanta Virus Symptoms of Hanta Virus Protect From Hanta Virus - हंता वायरस क्या है इसके लक्षण बचने के उपाय। 


What is Hanta Virus Symptoms of Hanta Virus Protect From Hanta


चीन के वुहान शहर से शुरू हुए कोरोना वायरस का संक्रमण दुनिया भर में तेजी से फैलता जा रहा है। भारत, अमेरिका, इटली, स्पेन समेत कई देशों में हर दिन को रोना संक्रमण के नए मामले सामने आ रहे हैं। इसके इलाज और वैक्सीन को लेकर रिसर्च भी जारी है  जिनमें से कई रिसर्च के सकारात्मक परिणाम भी सामने आ रहे हैं । कोरोना से सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाला चीन इस समय इस पर नियंत्रण की जी तोड़ कोशिश में लगा है। इसी बीच एक नए वायरस ने एक बार फिर चीन की चिंता बढ़ा दी है।  इस वायरस का नाम है - हंता वायरस ।

इस वायरस से चीन में एक व्यक्ति की मौत हो चुकी है।

आइए जानते हैं इस वायरस के बारे में विस्तार से:

चीन के यूनान प्रांत में हंता वायरस से जिस व्यक्ति की मौत हुई वह बस से साडोंग प्रांत लौट रहा था। उसे लोगों ने पहले कोरोना से पीड़ित समझा। बाद में जब उसको Hospital लाया गया तो जांच में पता चला कि उसे कोरोना virus नहीं हंता Virus था।

इसके बाद बस में सवार सभी 32 यात्रियों की जांच की गई। हालांकि इस मामले में फिलहाल बहुत ज्यादा जानकारी नहीं मिल पाई है । हंता वायरस से व्यक्ति की मौत की जानकारी चीन के सरकारी समाचार पत्र ग्लोबल टाइम्स ( Global Times ) द्वारा दी गई है। इसके बाद यह चर्चा का विषय बन गया है कि क्या हंता वायरस भी कोरोना वायरस की तरह ही खतरनाक है!

Symptoms of Hanta Virus - हंता वायरस के लक्षण 


हंता वायरस के लक्षण भी कोरोना वायरस के लक्षणों से काफी हद तक मेल खाते हैं। अमेरिका के सेंटर फॉर कंट्रोलर प्रिवेंशन (सीडीसी) के मुताबिक हंता वायरस से संक्रमित होने पर ।

1 व्यक्ति को तेज बुखार होता है

2 यह बुखार 101 डिग्री से ऊपर भी हो सकता है

3 संक्रमित व्यक्ति के सिर में और शरीर में दर्द होता है

4 जिस व्यक्ति को अंता वायरस होता है उसे उल्टी पेट में दर्द की समस्या हो सकती है

5 संक्रमित व्यक्ति को डायरिया की शिकायत हो सकती है

6 संक्रमित व्यक्ति के बाद के लक्षणों में फेफड़े में पानी जमा हो सकता है

7 संक्रमित व्यक्ति को सांस लेने में तकलीफ हो सकती है

8 संक्रमित व्यक्ति को और भी बहुत सारे लक्षण हो सकते हैं जिनकी अभी पुष्टि नहीं की गई है।

यह भी देखे - 
 1. कोरोना को हराओ देश को बचााओ



What is Hanta Virus ,How Hanta Virus Spread - क्या है हंता वायरस और यह कैसे फैलता है ।


हंता वायरस रोडेंट ( चूहे एवं गिलहरी की तरह ) जो चूहे की एक प्रजाति है उसके शरीर में होता है इससे चूहे को तो बीमारी नहीं होती लेकिन यह इंसान की मौत का कारण बन सकता है ।



सीडीसी के मुताबिक हंता वायरस का संक्रमण हवा या सांस के जरिए नहीं फैलता।

अगर एक व्यक्ति इस वायरस से पीड़ित है तो उससे दूसरे व्यक्ति को संक्रमण नहीं फेलता।

अगर कोई व्यक्ति चूहे के संपर्क में आता है ,तो उसे हंता वायरस के संक्रमण का खतरा हो सकता है।

चूहें के लार,थूक,मल, या मूत्र के संपर्क में आने से और इन्हीं हाथो से आँख ,कान ,नाक , मुँह वगैरह छूने से इसका संक्रमण हो सकता है ।


Protect and Cure from Hanta Virus - हंता वायरस से बचाव और इलाज


इससे बचने का फिलहाल यह तरीका है कि चूहों से दूरी बनाकर रखी जाए। खासकर चूहे के लार,थूक ,मल-मूत्र से बच कर रहे । इसका फिलहाल कोई प्रॉपर इलाज सामने नहीं आया है। फ्री प्रेस जर्नल की रिपोर्ट के मुताबिक संक्रमण होते ही चिकित्सकीय देखभाल की जरूरत है। सांस संबंधी परेशानी में आईसीयू में भर्ती करना और ऑक्सीजन थेरेपी देने से राहत हो सकती है।

How much Risk in India From Hanta Virus - हंता वायरस से भारत मे कितना खतरा 


सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रीवेंशन की रिपोर्ट के मुताबिक यह वायरस अभी तक सिर्फ चीन और अर्जेंटीना में ही पाया गया है । चीन में भी इस वायरस से एक व्यक्ति की मौत हुई है सीडीसी के मुताबिक चूहों के मल मूत्र से दूर रहे तो इस वायरस का संक्रमण नहीं होगा। इसका संक्रमण व्यक्ति से व्यक्ति में नहीं फैलता ।

इस लिहाज से भारत में अभी इसका खतरा नहीं है
Cherry Tree Short Story In Hindi | चेरी का व्रक्ष और रोकी की मेहनत  ।

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Cherry Tree Short Story In Hindi

Cherry Tree Short Story In Hindi

Cherry Tree Short Story In Hindi


रस्किन बौन्ड ने यह एक सुन्दर  छोटी सी कहानी लिखी । यह कथा एक छोटे से लड़के रोकी की है, जो मसूरी में रहता था।  जिसकी उम्र छः साल की है। उसने अपने बगीचे में एक चेरी फल का बीज लगाया जिसका सुझाव उसके दादा जी ने दिया था।

कुछ महीने बाद वह देखता है कि उस बीज ने अब एक छोटे पौधे का रूप ले लिया है । वह उस पौधे की बहुत देखभाल करता है , और चेरी का पौधा जल्दी बढ़ने लगता है ।

दो बार ऐसे अवसर आते हैं जब पौधा मरने की स्थिति में आ जाता है जब एक बकरी उसके पूरे पत्ते खा जाती है और एक औरत का पांव फिसल कर उसकी टहनी को आधे भाग में काट देती है। लेकिन पौधा फिर भी जल्दी बढ़ने लगता है और 3 साल बाद उसमें फल लगते हैं।

फल कुछ खट्टे होते हैं पर दादाजी उसको कहते हैं कि अगले साल मीठे फल का इंतजार करें ।

एक दोपहर दादाजी देखते हैं कि रॉकी बगीचे में लेटा हुआ है और शाम तक आकाश को देखता रहता है। रॉकी फिर अपने दादाजी से पूछता है की उन्हें इस चेरी के पेड़ से इतना लगाव क्यों है।

इस पर दादाजी कहते हैं कि क्योंकि हमने इसे लगाया है इसलिए हमें इससे लगाव है तो रॉकी कहता है कि" ईश्वर होने जैसा अनुभव शायद यही होता है।

" क्योंकि जिसको हम पालते हैं पोसते है ,उनके प्रति हमारा लगाव हमेशा बना रहता है । वैसे ही भगवान भी है ,जो हमारा पालन पोषण करते है । वो हमसे बहुत प्यार करते है।

केवल आप ही स्वतंत्र नहीं है । A Best Moral Story In Hindi 2020

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एक बार मुंबई शहर मैं एक वृद्ध महिला एक सड़क के बीच में चल रही थी।

इससे यातायात में बहुत व्यवधान हो रहा था जब उसे यह बताया गया कि उसे सड़क के किनारे नहीं चलना चाहिए तो उसने जवाब दिया कि वह स्वतंत्र है ।

जहां चाहे चल सकती हैं। परंतु प्रश्न यह उठता है कि कारें एवं गाड़ियां सड़क किनारे या पगडंडी पर चलती तो कितनी अव्यवस्था होती ।

 इसलिए अपनी स्वतंत्रता को महत्व देने के साथ- साथ अन्य लोगों की स्वतंत्रता का भी ध्यान रखना चाहिए। स्वतंत्रता केवल किसी व्यक्ति की स्वयं की चीज नहीं है।

व्यक्ति को बहुत से संदर्भ में उसके मन की करना चाहिए परंतु बहुत से संदर्भ ऐसे होते हैं जिसमें उसे उसकी स्वतंत्रता से ज्यादा दूसरों की स्वतंत्रता का ध्यान रखना चाहिए पुलिस टॉप एक व्यक्ति के अधिकार से ज्यादा दूसरों के अधिकार का भी महत्व होता है।

छोटी छोटी चीजों में हमें अन्य लोगों की सुविधा का ध्यान रखना आवश्यक है। यही अच्छे व्यक्तित्व की निशानी है ।